Thursday, August 13, 2015

मुक्तक कुँवर कुसुमेश के


  आँख में आँसू छुपे हैं शबनमी परिवेश के। 
वह क़लम क्या जो लिखे कविता बिना संदेश के। 
आपके है सामने इक मज्मुअः की शक्ल में,
देखिये कैसे लगे "मुक्तक कुँवर कुसुमेश के" ।
-कुँवर कुसुमेश  

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (15-08-2015) को "राष्ट्रभक्ति - देशभक्ति का दिन है पन्द्रह अगस्त" (चर्चा अंक-2068) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    स्वतन्त्रतादिवस की पूर्वसंध्या पर
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत सुंदर

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  3. कुशुमेश जी बहुत बहुत मुबारक.

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