Tuesday, September 15, 2015

पुस्तक समीक्षा

 पुस्तक समीक्षा
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ग़ज़ल की मक़बूलियत से भला कौन वाक़िफ़ नहीं है। ग़ज़ल ने अगर उर्दू अदब को मालामाल किया है तो पिछले लगभग तीन दशकों में इसने हिन्दी साहित्य में भी बड़ी मजबूती से अपने पैर जमाये हैं। इस दौरान हिन्दी ग़ज़ल के एक से एक बेहतरीन ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुए हैं। ऐसा ही एक ताज़ा-तरीन ग़ज़ल संग्रह "सराबों में सफ़र करते हुए" इस वक़्त मेरे हाथों में है। रूड़की (उ०प्र०) के जाने-माने साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार जी ने, हिन्दी साहित्य को इस किताब से पहले, छः पुस्तकें दी हैं जिनमे 3 उपन्यास, 2 कहानी सग्रह और 1 ग़ज़ल संग्रह, पानी की पगडण्डी, उल्लेखनीय हैं। 'सराबों में सफ़र करते हुए" इनका दूसरा ग़ज़ल संग्रह है। संग्रह में 102 गज़लें हैं। ग़ज़ल हालाँकि कई बहरों पर देखने को मिलीं इस संग्रह में मगर बहरे-हज़ज मुसम्मन सालिम में लगभग आधे से ज़ियादा हैं। वास्तव में बहरे-हज़ज मुसम्मन सालिम बड़ी प्रचिलित और रसीली बहर है। इसके अर्कान मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन ने तो ग़ज़लकारों पर जैसे जादू कर रक्खा है। लगभग हर ग़ज़लकार इस बहर का मुरीद है। यूँ तो यह बहर मुफ़रद बहरों में से एक है मगर मशहूरो-मारूफ शायर जनाब मुनव्वर राना ने इस बहर पर बेशुमार ग़ज़लें कहकर लोगों को इस बहर का दीवाना बना दिया। इस ग़ज़ल संग्रह में बहरे-हज़ज मुसम्मन सालिम पर ग़ज़लकार जनाब कृष्ण कुमार का एक लाजवाब मतले का शेर क़ाबिले-ग़ौर है:-
उठाने के लिये नुक़्सान तू तैयार कितना है।
तेरा झुकना बताता है की तू खुद्दार कितना है।
पेज-17
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इसी बहर में एक और अच्छा शेर :-
यहाँ खामोशियों ने शोर को बहरा बना डाला,
हमारी ज़िंदगी किन तल्ख़ आवाज़ों पे ठहरी थी।
पेज-18
ऊँचे पदों पर बैठे लोगों की कारगुज़ारी से आहत शायर कह उठता है कि :-
किसी मुफ़लिस को क्या देंगे ये ऊँचे ओहदे वाले,
इन्हीं का पेट भरता है गरीबों के निवाले से।
पेज-30
चारो तरफ फैलते नफरत के कारोबार में भी ग़ज़लकार मुहब्बत की अलख जगाये रखने की पैरवी करता नज़र आता है :-
किसी सूरत भी हो मुम्किन,हुनर से या दुआओं से।
न बुझने दो मुहब्बत के चरागों को हवाओं से।
पेज-39
निम्न अशआर में ग़ज़लकार ने मुहब्बत की डगर पकडे रहने के रास्ते भी सुझाये हैं। इस मतले में रदीफ़ के निर्वाह का भी जवाब नहीं। देखें ;-
फरिश्ता बन नहीं सकते ये माना प्यार में लेकिन,
झरोखा खोल तो सकते हो हर दीवार में लेकिन।
जिसे जितनी ज़रुरत है वो उतना साथ देता है,
मैं खुद को खर्च करता हूँ बड़ी मिक़्दार में लेकिन।
पेज-63
बहरे-रमल मुसम्मन महजूफ में भी शायर का एक शेर देखने क़ाबिल है ;-
प्यास के सैलाब में दर्या किनारा है कहाँ।
डूबते को एक तिनके का सहारा है कहाँ।
पेज-77
पर्यावरण प्रदूषण से एक रचनाकार का चिंतित होना स्वाभाविक है। ऐसे में ग़ज़लकार कह उठता है कि :-
है किसी की दुआ का असर धूप में।
मुझको मिलते रहे हैं शजर धूप में।
पेड़ काटे तो हमने ये सोचा नहीं,
काटनी है हमें दोपहर धूप में।
पेज-91
ग़ज़ल की भाषा हिन्दी-उर्दू मिश्रित बोलचाल की है इसीलिए आसानी से ग्राह्य है। ग़ज़ल के शिल्प का ख़ास ख्याल रक्खा गया है जो क़ाबिले-तारीफ़ है। हालाँकि, शायद अनजाने में ही,पहली ग़ज़ल के मतले का मिसरा सानी ऐबे-तनाफ़ुर की गिरफ़्त में गया है। ग़ज़लों में मक़ते का शेर नहीं है जो हिंदी की ग़ज़लों में अब अक्सर नहीं दिखता अतः इसे ऐब नहीं माना जाना चाहिए जबकि उर्दू के ग़ज़लगो इसे ज़रूरी समझते हैं। छपाई साफ़-सुथरी और कवर पेज खूबसूरत है।
ग़ज़लकार को दिली मुबारकबाद। शायर अदबी सफर पर पूरी कामयाबी के साथ ताउम्र गामज़न रहे , यही दुआ है।
अयन प्रकाशन ,नई दिल्ली से वर्ष 2015 में छपी इस पुस्तक का मूल्य रु० 220/- है।
पुस्तक हेतु बधाई देने अथवा पुस्तक खरीदने के लिए ग़ज़लकार से उनके मोबाइल नं० 9917888819 या 9897336369 पर संपर्क किया जा सकता है।
कुँवर कुसुमेश
4/738 विकास नगर,लखनऊ-226022
मोबा:09415518546

2 comments:

  1. बेहतरीन समीक्षा...

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  2. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार....

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