Monday, January 24, 2011


     आज़ादी में जी रहे ........
(कुण्डली)

कुँवर कुसुमेश 

आज़ादी में जी रहे , छः दशकों से आप,

सुख के पल दो-चार हैं,अनगिन हैं संताप.

अनगिन हैं, संताप हर तरफ शोर मचा है,

दुःख का बादल सभी ओर घनघोर उठा है.

लूट रहे हैं लोग पहनकर कुर्ता खादी,

बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी.
******
       जय हिन्द,जय भारत .

59 comments:

  1. यही तो विडम्बना है.... बहुत सटीक रेखांकित किया कुछ शब्दों में आपने....

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  2. गणतंत्र के तंत्र में जो विद्रूपता आ गई है, उस पर प्रहर करती कुंडली... सुन्दर

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  3. आपने तो इस कुंडली में महागाथा लिख डाला है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    बालिका दिवस
    हाउस वाइफ़

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  4. आज की दुनिया का कटु शाश्वत वास्तविक सत्य ..
    कटाक्ष बहुत अच्छा लगा.

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  5. बहुत ही प्रासंगिक रचना गणतंत्र के अवसर पर....

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  6. आज़ादी में जी रहे लेकिन हम नही यह नेता जिन्हे घाटोले करने की,जमाखोरी करने की, गुंडा गर्दी करने की आजादी हे, बाकी जनता तो रोटी के ही चक्कर मे घुम रही हे...
    बहुत सुंदर रचना धन्यवाद

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  7. सुनने में कटु भले लगे.....

    पर वास्तविक सत्य है आज की प्रजातंत्र का..

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  8. प्रेरक रचना के लिए बधाई स्वीकार कीजिए। इसे पढ़ कर सुखद अनुभूति हुई। कल नेताजी सुभाषचंद बोस की जयन्ती थी उन्हें याद कर युवा शक्ति को प्रणाम करता हूँ। आज हम चरित्र-संकट के दौर से गुजर रहे हैं। कोई ऐसा जीवन्त नायक युवा-पीढ़ी के सामने नहीं है जिसके चरित्र का वे अनुकरण कर सकें?
    ============================
    मुन्नियाँ देश की लक्ष्मीबाई बने,
    डांस करके नशीला न बदनाम हों।
    मुन्ना भाई करें ’बोस’ का अनुगमन-
    देश-हित में प्रभावी ये पैगाम हों॥
    ===========================
    सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी

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  9. तथाकथित आज़ादी का पोल खोलती बेहतरीन रचना है ...

    लूट रहे हैं लोग पहनकर कुर्ता खादी,
    बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी.

    गाँधी जी को यदि ये समझ में अत कि खादी का इस्तमाल किस तरह होने वाला है तो शायद वो कड़ी के बारे में सोचते भी नहीं ...
    खादी तो भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी है ...

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  10. आज की स्तिथि को दर्शाती है आप की खूबसूरत कुंडली.हम फिर भी गणतंत्र दिवस की शुभ कामनाएं देते हैं.शायद कभी शुभ हो जाए.................

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  11. aisi hi rahegi azaadi ... kyonki 'main'se baahar koi sochta hi nahi

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  12. बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी
    बहुत सुंदर रचना धन्यवाद

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  13. कुसुमेश जी,

    सत्य!!

    सुख के पल दो-चार हैं,अनगिन हैं संताप.

    यह कुंडली तो एक पंक्ति में सब कुछ कह गई।

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  14. लूट रहे हैं लोग पहनकर कुर्ता खादी,

    बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी.

    आद . कुंवर जी,
    गणतंत्र दिवस के अवसर पर आपने देश की सच्ची तस्वीर पेश की है !
    कुंडली का ज़वाब नहीं ,बड़ी मारक है !

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  15. लूट रहे हैं लोग पहनकर कुर्ता खादी,
    बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी.

    बिकुल सही कहा आपने कुंवर जी .... रक्षक और भक्षक में अंतर कर पाना लगभग नामुमकिन सा हो गया है ....

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  16. लूट रहे हैं लोग पहनकर कुर्ता खादी,


    बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी.
    कुंवर जी बहुत अच्छा प्रहार किया है आप ने
    बहुत सुन्दर
    बहुत - बहुत शुभकामना

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  17. कडुवी सच्चाई की झलक मिली इस रचना में .

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  18. एक सच बयां करती सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

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  19. यही तो विडम्बना है……………सटीक और सार्थक अभिव्यक्ति।

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  20. जब तक सोच के दायरे और नहीं बढाए जायेंगे... तब तक हालात यूँही रहेंगे...
    बहुत अच्छा लिखा है आपने..
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं...

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  21. बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी.

    ह्म्म्म.कुंवर जी .......बहुत अच्छी रचना है.......सच्चाई को ब्यान करती

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  22. बेचारी आजादी तो पता नही कब से सिसक रही हे --सिसक -सिसक कर उसका दम धुटने लगा हे --इससे तो गुलामी भली --कम से कम हम कह तो सकते थे की हम गुलाम हे |

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  23. बहुत सधा हुआ कुण्डलिया छन्द प्रस्तुत किया है आपने!
    देश की हालत का बिल्कुल सही आकलन।

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  24. कुण्‍डली के बहाने बहुत गहरी बात कह दी आपने। हार्दिक बधाई।

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    क्‍या आपको मालूम है कि हिन्‍दी के सर्वाधिक चर्चित ब्‍लॉग कौन से हैं?

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  25. बहुत समसामयिक कुंडली...गहरी चोट करती हुई...बधाई स्वीकरें

    नीरज

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  26. बिलकुल सच कहा ..... सिसकती आज़ादी ..खुबसूरत रचना ..बधाई

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  27. बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी...
    बिलकुल सच..हम कहते रहते है आज़ादी आज़ादी ..पर कहाँ है वो, पहले अंग्रेजो के गुलाम थे और आज अपनों ने ही गुलाम बना रखा है, अपने ही देश को..

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  28. कुण्डलिया छंद
    और
    प्रभावशाली शब्दों से सजी सँवरी
    बहुत शानदार रचना ....

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  29. आजादी के छेह दशकों के बाद भी भूखमरी है, लाचारी है , गरीबी है , बईमानी , भ्रष्टाचार है , बलात्कार है । शर्मनाक है ये हमारे लिए। हमारे शहीद जिन्होंने बलिदान दिया अपने प्राणों का , शायद वे भी सिसकते होंगे अपनी कब्रों में।

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  30. लूट रहे हैं लोग पहनकर कुर्ता खादी,
    बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी.

    विचारोत्तेजक कविता के लिए बधाईयाँ .....

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  31. भारतीय गणतंत्र पर कुंडली मार कर बैठे हुए लोगों पर उंगली उठाती एक धारदार कुंडली।
    बहुत बढ़िया, कुसुमेश जी।

    फिर भी, गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  32. बहुत सुंदर ...गणतंत्र दिवस की मंगलकामनाएं ..सादर

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  33. कुशमेश जी , बहुत ही सही वर्णन किया है आपने आजादी का......... सच कभी कभी तो ये आजादी अर्थहीन लगने लगती है.............

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  34. गागर में सागर भर दिया है आपने।गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं।

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  35. "बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी"

    बहुत ही सटीक और सार्थक प्रस्तुति

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  36. लूट रहे हैं लोग पहनकर कुर्ता खादी,
    बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी.

    कुंडली मार कर बैठे खादी धारियों पर आपने
    खूब मारी है कुंडली .....

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  37. बहुत सही कहा सर!

    आप सब को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं.
    सादर
    ------
    गणतंत्र को नमन करें

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  38. आपका कहना बिलकुल बाजिव है ...शुक्रिया

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  39. behad sunser bhaw ke sath badhati rachana.ye gajal bhi bahut sunder hai.

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  40. बहुत शानदार कुण्डलियाँ कलमबद्ध की हैँ ।

    गणतंत्र दिवस की शुभकामनायेँ बाबू जी ।

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  41. चण्द शब्दों मे आपने बहुत कुछ कह दिया ।

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  42. बहुत खुबसूरत रचना !

    गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत बधाई !

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  43. गणतंत्र दिवस पर अच्छी प्रस्तुति. सीधा अच्छा कटाक्ष .सामायिक रचना वो भी चंद पंक्तियों में बहुत कुछ

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  44. जय हिंद -- बहुत सुन्दर प्रस्तुति .. आज का संताप आजादी के बाद .. सटीक..

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  45. वाह, यह तो बहुत सुन्दर कविता है..गणतंत्र दिवस पर आपको हार्दिक बधाई.

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  46. यह कुंडली हमें भारतेंदु युग में लेकर चली गई... शब्द चित्रण अच्छा लगा.. नया सन्देश देती कुंडली अत्यत प्रभावशाली बन पड़ी है..

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  47. लूट रहे हैं लोग पहनकर कुर्ता खादी,
    बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी.

    बहुत ख़ूब सर जी....पढ़कर एक बार फिर से हकीकत का अहसास हो गया।

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  48. लूट रहे हैं लोग पहनकर कुर्ता खादी,

    बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी.
    बिलकुल सही कहा आपने आज के हालत देख कर शहीदों की आत्मा भी खून के आंम्सू रोती होगी।

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  49. बहुत सटीक पोस्ट है सच बात है आज़ादी बेचारी असहाय सिसकती रही है !

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  50. aapne to aaj ki samajikta ko
    darsa diya
    sunder rachna
    ...

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  51. लूट रहे हैं लोग पहनकर कुर्ता खादी,
    बेचारी असहाय सिसकती है आज़ादी.
    ******

    man ke sare dard ko udel diya aapne to..

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  52. अच्छा छन्द प्रस्तुत किया है, आदरणीय कुसुमेश जी

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