Saturday, July 2, 2011


ग्रह - उपग्रह
(दोहे)
कुँवर कुसुमेश 

                                                          अवगाहन के योग्य है,सूरज का साहित्य.
तेरह लाख गुना बड़ा,पृथ्वी से आदित्य.

सूरज के परिवार को,कहते मंडल-सौर.
                                    नौ ग्रह नियमित घूमते,सूरज के चहुँ ओर.

साबित करते हैं यही,वैज्ञानिक अभिलेख.
अपनी पृथ्वी भी इन्हीं,नौ ग्रह में है देख.

बुध,पृथ्वी,शनि,बृहस्पति,अरुण,वरुण के संग.
मिलकर मंगल,शुक्र,यम,नौ ग्रह हुए दबंग

ग्रह -उपग्रह पर जीत की,लगी हुई है होड़.
प्रकृति संतुलन को रहा,मानव तोड़-मरोड़.

क्या बसंत क्या शरद ऋतु,क्या गर्मी बरसात.
पृथ्वी अपनी धुरी पर,घूम रही दिन रात.
  *****

73 comments:

  1. नवग्रहों समेत पृथ्वी एवं दिनकर का सुन्दर वर्णन

    ग्रह -उपग्रह पर जीत की,लगी हुई है होड़.
    प्रकृति संतुलन को रहा,मानव तोड़-मरोड़.

    मनुष्य का प्राकृतिक हस्तक्षेप सीमाएं पर कर गया तो पृथ्वी का घूर्णन बदल जायेगा ..फिर शायद कुछ कलयुगी पंक्तिया जोड़नी पड़े इस कविता में

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  2. कुंवर साहब!

    यह कमाल सिर्फ़ आप ही कर सकते हैं।

    एक से एक सधे हुए दोहे, वह भी एक ही विषय ग्रह-उपग्रह पर। साथ ही पर्यावरण संरक्षण के ऊपर संदेश!

    बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  3. बहुत अच्छी भोगोलिक कविता

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  4. आकर्षक और ज्ञानवर्द्धक दोहे।
    अनूठे विषय पर अनूठी रचना।

    वैसे, अब सौर मंडल में आठ ही ग्रह हैं। ग्रह की नई परिभाषा में यम खरा नहीं उतरता।

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  5. क्या बसंत क्या शरद ऋतु,क्या गर्मी बरसात.
    पृथ्वी अपनी धुरी पर,घूम रही दिन रात.bahut sare tathyon ko sanjoya hai

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  6. कुँवर साहब! सौर मण्डल का निरूपण दोहों में, बहुत सुन्दर ख़ासकर बच्चों के लिए अति उपयोगी क्योंकि कविताएँ यदि रट जायँ तो कभी नहीं भूलतीं वह भी दोहा जैसा प्रभावी छन्द। तमाम परिभाषाएं हमें अब भी छन्दबद्ध याद हैं। आपके इस वर्णन को और ज्यादा प्रभावी और सामयिक बनाया है इसमें निहित प्राकृतिक संतुलन का संकेत लब्बोलुवाब यह कि आपके ये दोहे बहुत ही उपयोगी, सार्थक और सामयिक बन पड़े हैं... आभार एवँ बधाई क़ुबूल फ़रमाएँर ख़ासकर बच्चों के लिए अति उपयोगी क्योंकि कविताएँ यदि रट जायँ तो कभी नहीं भूलतीं वह भी दोहा जैसा प्रभावी छन्द। तमाम परिभाषाएं हमें अब भी छन्दबद्ध याद हैं। आपके इस वर्णन को और ज्यादा प्रभावी और सामयिक बनाया है इसमें निहित प्राकृतिक संतुलन का संकेत लब्बोलुवाब यह कि आपके ये दोहे बहुत ही उपयोगी, सार्थक और सामयिक बन पड़े हैं... आभार एवँ बधाई क़ुबूल फ़रमाएँ

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  7. ऊपर आकाश में ये ग्रह चलते चाल
    ऐसी-तैसी हो गयी हाल हुआ बेहाल...

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  8. शायद ही किसी नें वैज्ञानिक सौर मण्ड़ल पर दोहे लिखे हों।

    ला-जवाब, अनमोल, मौलिक और नवयुग का चमत्कार किया आपनें

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  9. हर बार की तरह बहुत खुबसूरत एक सीख देती पोस्ट |

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  10. सुन्दर दोहों (सत्साहित्य) के माध्यम से वैज्ञानिक जानकारियाँ देने का महान कार्य ............अति प्रशंसनीय

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  11. बहुत सुंदर जानकारी दोहे के रूप में आपका जबाब नहीं दिल से निकला वाह वाह ..

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  12. bahut achchhi kavita ..vaigyanik kavita .aabhar

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  13. bahut hi shandar post
    vakayi ek dam alag
    aabhar

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  14. सौर मंडल के बारे में जानकारी देते सार्थक दोहे .. चंद्रभूषण जी की बात से मैं भी सहमत हूँ

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  15. Ni:shabd kar diya aapkee is rachana ne! Kya kamal hai!

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  16. ग्रह -उपग्रह पर जीत की,लगी हुई है होड़.
    प्रकृति संतुलन को रहा,मानव तोड़-मरोड़.
    सुंदर अर्थपूर्ण दोहे...

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  17. नवग्रहों को बहुत खूबसूरती से बाँधा है आपने इन सुन्दर दोहों में!

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  18. अद्भुत प्रस्तुति है आज की आपकी ..!!
    बहुत सारी भावनाओं को समेटे हुए ...
    बहुत सुंदर रचना ....!!

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  19. सुन्दर वैज्ञानिक बालगीत

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  20. साबित करते हैं यही,वैज्ञानिक अभिलेख |
    अपनी पृथ्वी भी इन्हीं,नौ ग्रह में है देख ||kya chintan kiya hai, maanana padega. mukammal adbhut aur sach. aafreen.

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  21. बहुत बढ़िया और ज्ञानवर्धक दोहे! अच्छी जानकारी मिली ! स्कूल में भूगोल पढ़ने के बाद आज आपके पोस्ट के दौरान वो यादें ताज़ा हो गयी! नए अंदाज़ के साथ शिक्षाप्रद प्रस्तुती!

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  22. वैज्ञानिक काव्य विवेचन हेतु धन्यवाद.

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  23. आपकी कविताएं सहजता से आत्मसात हो जाती है

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  24. बड़ी ही सधी हुई शैली में आपने ग्रहों उपग्रहों की जानकारी बता दी है ! बच्चों के लिए कंठस्थ करने लायक दोहे हैं ! काव्य रचना के लिए ऐसे अनूठे विषय को चुनने के लिए आपको अनेक बधाइयाँ !

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  25. बहुत ही उपयोगी जानकारी से भरपूर
    दोहे पढ़ कर मन बहुत प्रसन्न हो गया
    आपका लेखन हर लिहाज़ से
    अनमोल और अनुपम होता है... हमेशा ही !!

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  26. आपका एक विषय को केंद्रीत कर दोहे कहने का अंदाज़ निराला है. इसे हिंदी काव्य की एक नई विधा या पुराणी विधा का नए रूप में, नए लबो-लहजे के साथ प्रस्तुतीकरण कह सकते हैं. आप इसके लिए बधाई के पात्र हैं.

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  27. ग्रह -उपग्रह पर जीत की,लगी हुई है होड़.
    प्रकृति संतुलन को रहा,मानव तोड़-मरोड़

    बहुत सही बात कही है सर!

    सादर

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  28. "बुध,पृथ्वी,शनि,बृहस्पति,अरुण,वरुण के संग.
    मिलकर मंगल,शुक्र,यम,नौ ग्रह हुए दबंग"

    एकदम नए प्रकार की रचना...

    "ग्रह -उपग्रह पर जीत की,लगी हुई है होड़.
    प्रकृति संतुलन को रहा,मानव तोड़-मरोड़."

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  29. सौर मंडल पर पहली कविता देखी है. भई वाह. कविता का अंत कहता है कि सौर मंडल चाहे जितना अलौकिक हो परंतु हमारे लिए ऋतुएँ बहुत अलौकिक हैं.

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  30. ग्रह -उपग्रह पर जीत की,लगी हुई है होड़.
    प्रकृति संतुलन को रहा,मानव तोड़-मरोड़.

    sahee......prakriti apna kaam apne nirdhaarit swaroop me hamesha karti rahti hai......lekin insaan apni swarthon ke liye uska santulan bigaad deta hai aur prakriti ko hi blame bhi...

    achhi abhivyakti....

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  31. ग्रह -उपग्रह पर जीत की,लगी हुई है होड़.
    प्रकृति संतुलन को रहा,मानव तोड़-मरोड़
    .
    अच्छा लगा पढ़ कर

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  32. vaah...kya dohe likhe hain kusumesh ji nao grah ka kitna sunder chitran hai.badhaai hai aapko.

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  33. wah bahut khob..kavita..aap bahut sur taal me likhjte hai...
    per shama chaungi..Yamm ab griho ki shreni se nikaal diya gaya hai...ab keval..8 grah..{planets} hi bacche hai....

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  34. पूरा सौर परिवार इन पंक्तियों में आ गया . पढ़कर मजा आ गया .

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  35. navgrahn se saji nav gooron se poorn rachna

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  36. बहुत सुन्दर तरीके से वैज्ञानिक ज्ञान की सहित्यिक प्रस्तुति.

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  37. साहित्य और विज्ञान का करा रहें हैं मेल ,
    कुंवर जी कुशेमेश के बाएं हाथ का खेल ।
    कुशुमेश जी यम या प्लूटो जी से ग्रह का दर्ज़ा छिन चुका है .अब श्री मान कहलातें हैं "प्लेनेतोइड ".ज़नाब आकार में सूरज के बेटे चन्द्रमा जी से भी छोटें हैं .फिर भी ज्योतिष पुत्र काचे काट रहें हैं ,पैसा कूट रहें हैं ।
    खेल खेल में ले ताल और दोहावली के ज़रिए आप विज्ञान शिक्षण कर रहें हैं .इस अदा पर कौन न मर जाए .

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  38. मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  39. कल 05/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी-पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  40. बुध,पृथ्वी,शनि,बृहस्पति,अरुण,वरुण के संग.
    मिलकर मंगल,शुक्र,यम,नौ ग्रह हुए दबंग ...

    वाह ... गज़ब के दोहे हैं सभी ... दोहों के साथ साथ अनमोल जानकारी भी समेटी है आपने ... बहुत खूब ..

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  41. बहुत ही सुन्दर,शानदार और उम्दा प्रस्तुती!

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  42. ग्रह-उपग्रह के विषय को पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर जो संदेश आपने दिया है बहुत ही ह्रदयग्राही है.
    आपकी गजल सदा की भांति सुन्दर है.

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  43. आपकी रचनाएँ सामान्य ज्ञान का वृहद् कोष हैं ...वाह...हमने इस रचना को कालोनी के स्कूल के बोर्ड पर लगाया है ताकि बच्चे आसानी से खगोल की जानकारी ले सकें और उन्हें क्या करना है सीख सकें.

    नीरज

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  44. सही बात कही है एक सीख देती पोस्ट |

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  45. ज्ञानवर्धक दोहे!कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई
    करीब 20 दिनों से अस्वस्थता के कारण ब्लॉगजगत से दूर हूँ
    आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

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  46. बहुत खूब ! खगोल विज्ञान विषय पर इतने सुन्दर दोहे..कमाल है..आभार

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  47. एक -एक शब्द अपने आप में अति सुन्दर !

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  48. प्लेनेट्स के भी भाई साहब दो स्वरूप हैं .इन्फीरियर और सुपीरिअर ,इनर एंड आउटर।
    बृहस्पति से लेकर यम तक सुपीरियर तथा बुद्ध से मंगल तक इन्फीरियर प्लेनेट्स कहलातें हैं .अच्छ्ही ज्ञानपरक प्रस्तुति .

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  49. ग्रह -उपग्रह पर जीत की,लगी हुई है होड़.
    प्रकृति संतुलन को रहा,मानव तोड़-मरोड़.

    ग्रह-उपग्रह विषय को पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर आपने जो संदेश दिया है बहुत ही ज्ञानवर्धक और महत्वपूर्ण है...सभी दोहे बहुत ही सुन्दर है.......

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  50. इतने गूढ़ विषय पर इतनी सुन्दर कविता... सुन्दर दोहे... अपने छोटे बच्चों को दे दी है पढने के लिए... ज्ञान बढेगा उनका भी...

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  51. ग्रह -उपग्रह पर जीत की,लगी हुई है होड़.
    प्रकृति संतुलन को रहा,मानव तोड़-मरोड़.

    क्या कमाल का लिखते हैं आप.
    मानव भी आखिर क्या करें.
    तोड़फोड़ की पुरानी आदत है.
    महान पूर्वज बंदरों का ही तो वारिस है.

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  52. बुध,पृथ्वी,शनि,बृहस्पति,अरुण,वरुण के संग.
    मिलकर मंगल,शुक्र,यम,नौ ग्रह हुए दबंग

    नवग्रहों पर सुन्दर दोहे... नूतन भाव....

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  53. ग्रह -उपग्रह पर जीत की,लगी हुई है होड़.
    प्रकृति संतुलन को रहा,मानव तोड़-मरोड़.

    आपने तो नि:शब्‍द कर दिया

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  54. Really very impressive sir ji....! I'm short of words to praise you. Congrats!

    Read my comment on your earlier post too.


    Thanks.

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  55. क्या बात है, बहुत सुंदर

    बुध,पृथ्वी,शनि,बृहस्पति,अरुण,वरुण के संग.
    मिलकर मंगल,शुक्र,यम,नौ ग्रह हुए दबंग ।

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  56. ग्रह -उपग्रह पर जीत की,लगी हुई है होड़.
    प्रकृति संतुलन को रहा,मानव तोड़-मरोड़.

    क्या बसंत क्या शरद ऋतु,क्या गर्मी बरसात.
    पृथ्वी अपनी धुरी पर,घूम रही दिन रात.

    han da prithvi ke astitva ko hi khatra ho gaya lagata hai ab to.
    sundar Dohe dada!

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  57. वाह! बहुत सुन्दर !नवग्रहों का सुन्दर वर्णन,एक सीख देती पोस्ट

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  58. awesome !!
    maza aa gaya padh kar.

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  59. आप का बलाँग मूझे पढ कर आच्चछा लगा , मैं बी एक बलाँग खोली हू
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

    मै नइ हु आप सब का सपोट chheya
    joint my follower

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  60. भूगोल की जानकारी भी इतने रोचक रूप से दी जा सकती है ,पहले कभी सोचा नहीं था :))

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  61. कमाल का वर्णन कविता के माध्यम से ...
    शुभकामनायें आपको !

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  62. सूरज की तरह ही बहुत खास है आपके लिखने का अंदाज़ .

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  63. प्रिय ब्लोग्गर मित्रो
    प्रणाम,
    अब आपके लिये एक मोका है आप भेजिए अपनी कोई भी रचना जो जन्मदिन या दोस्ती पर लिखी गई हो! रचना आपकी स्वरचित होना अनिवार्य है! आपकी रचना मुझे 20 जुलाई तक मिल जानी चाहिए! इसके बाद आयी हुई रचना स्वीकार नहीं की जायेगी! आप अपनी रचना हमें "यूनिकोड" फांट में ही भेंजें! आप एक से अधिक रचना भी भेजें सकते हो! रचना के साथ आप चाहें तो अपनी फोटो, वेब लिंक(ब्लॉग लिंक), ई-मेल व नाम भी अपनी पोस्ट में लिख सकते है! प्रथम स्थान पर आने वाले रचनाकर को एक प्रमाण पत्र दिया जायेगा! रचना का चयन "स्मस हिन्दी ब्लॉग" द्वारा किया जायेगा! जो सभी को मान्य होगा!

    मेरे इस पते पर अपनी रचना भेजें sonuagra0009@gmail.com या आप मेरे ब्लॉग sms hindi मे टिप्पणि के रूप में भी अपनी रचना भेज सकते हो.

    हमारी यह पेशकश आपको पसंद आई?

    नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है! मेरा ब्लॉग का लिंक्स दे रहा हूं!

    हेल्लो दोस्तों आगामी..

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  64. ऐसी रचनाएं ज्‍यादा से ज्‍यादा लिखी जानी चाहिए। इस शमा को जलाए रखें।

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  65. क्या बसंत क्या शरद ऋतु,क्या गर्मी बरसात.
    पृथ्वी अपनी धुरी पर,घूम रही दिन रात.
    आद. कुसुमेश जी,
    यह कहते हुए मुझे थोड़ी भी हिचक नहीं है कि आपकी हर रचना पाठकों से अपना लोहा मनवा लेने में सक्षम होती है ! आपकी कलम जो भी लिखती है उसका अपना एक आसमान होता है जिसकी ऊंचाई आपके मेयार का आईना होती है ! साहित्य को समृद्ध करने में आपका योगदान स्तुत्य है !
    आभार !

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  66. बेहद प्रभावी शैली में नवग्रहों का वर्णन . एक बार याद हो जाए तो कभी भूले ही नहीं. कोशिश करुँगी, याद कर सकूँ.

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