Wednesday, June 24, 2015

अब्र बरसे हैं.........................


लोग पानी को खूब तरसे हैं। 
तब कहीं जाके अब्र बरसे हैं। 
देर क्यों लग रही  मेरे मौला,
ख्वाब मेरे तो मुख़्तसर से हैं। 
-कुँवर कुसुमेश
 अब्र-बादल ,मुख़्तसर-थोड़े 

8 comments:

  1. सुंदर पंक्तियाँ..

    ReplyDelete
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (26-06-2015) को "यही छटा है जीवन की...पहली बरसात में" {चर्चा अंक - 2018} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    ReplyDelete
  3. खूबसूरत पक्तियां

    ReplyDelete
  4. आयी बरखा बहार
    पड़ी पहली फुहार
    बहुत सुन्दर

    ReplyDelete