Friday, August 7, 2015

तग़ज़्ज़ुल



शेर कहने में तग़ज़्ज़ुल का ख़ास महत्व है। तग़ज़्ज़ुल यानी शेर में किसी चमत्कृत करने वाली बात से गहराई लाना।  तग़ज़्ज़ुल के बिना शेर सपाट बयानी हो कर रह जाता है जो फन्ने-अरूज़ के लिहाज़ से शेर की ज़रूरतों को पूरा नहीं करता, भले ही वज़्न/अरकान,बहर  आदि के लिहाज़ से वो एकदम दुरुस्त ही क्यों न हो। तग़ज़्ज़ुल को माहिरे-फ़न उस्ताद ख्वाब अकबराबादी ने तीन हिस्सों में परिभाषित किया है। 

1-क़दीमी तग़ज़्ज़ुल:-रिवायती लबो-लहज़े में चमत्कृत करने वाली बात,मसलन-हुस्नो-इश्क़ और जामो-मीना पर 
2-जदीदी तग़ज़्ज़ुल:-हुस्नो-इश्क़ और जामो-मीना से इतर चमत्कृत करने वाली बात

3-फ़िक्री तग़ज़्ज़ुल:-कोई गहरी चिंतनपरक चमत्कृत करने वाली बात


ग़ज़ल अपने शुरूआती दौर में क़दीमी तग़ज़्ज़ुल से लबरेज़ रहती थी। समय के बदलाव के साथ साथ ग़ज़ल हुश्नो-इश्क़ और जामो- मीना से बाहर निकली और उसने क़दीमी तग़ज़्ज़ुल की दीवार लांघ कर जदीदी तग़ज़्ज़ुल की और अपना रुख किया। जदीदी तग़ज़्ज़ुल के आते ही इसके लबो-लहज़े में भी तब्दीलियाँ आयीं। ऐसे में तग़ज़्ज़ुल से समझौता न करते हुए इसने अरबी,फारसी और उर्दू के अलावा बोलचाल की भाषा को भी आत्मसात करना शुरू किया और हिन्दी, प्रांतीय भाषा तथा अंग्रेजी भाषा के बोलचाल के, यूँ कहे कि अासानी से ग्राह्य होने वाले, शब्दों को लेते हुए उड़ान भरी। जदीदियत की ज़मीन पर इसके पैर पड़ते ही फन्ने-अरूज़ ने भी नए सिरे से सर उठाना शुरू किया और कुछ फन्नी रिआयतों की ज़रूरत सामने आने लगी । ऐसे में आहिस्ता आहिस्ता फन्ने-अरूज़ में कुछ रिआयती बदलाव आये जिसका लाभ नई पीढ़ी को मिलने लगा। इन ज़रूरी रिआयतों का ज़िक्र अरूज़ी शायरों ने भी करना शुरू किया। नतीजा ये है कि आज हिंदी में भी तग़ज़्ज़ुल से भरपूर लाजवाब ग़ज़लें कही जा रही है। जो लोग ग़ज़ल से दिली तौर पर जुड़े हैं वो एक अच्छे पाठक भी हैं और अपने अध्ययन से अपनी जानकारियों को update करते रहते हैं मगर जो ऐसा नहीं कर रहे, वो update नहीं हो पाते और लकीर के फ़क़ीर हो कर रह जाते हैं यह एक दुखद पहलू भी है। 

ज़रा सोचिये अब कोई डॉक्टर एंटीबायोटिक की जगह पचासों वर्ष पुरानी teramycin,tetracycline या penicillin prescribe करता है। नहीं। क्योकि डॉक्टर्स अपडेट हो रहे हैं और उन्हें latest एंटीबायोटिक की जानकारी है और तभी वो सफल है।
-कुँवर कुसुमेश
Mob:09415518546

Monday, July 27, 2015

आखिरी सलाम कलाम साहब............................


हाज़िर है आपको आखिरी सलाम कलाम साहब :-

लाज़िमी है आँख नम होना किसी के प्यार में। 
खासकर जब आदमी अच्छा लगे व्यवहार में। । 
आपने कुछ ख़ास ही दिल में बना ली थी जगह,
आप जैसे  लोग  अब  मिलते  कहाँ संसार में। । 
-कुँवर कुसुमेश 

Friday, July 17, 2015

हुक्मे-रब्बी है........................


हुक्मे-रब्बी है, हमें राह पे लाने के लिये । 
ये महज़ रस्म नहीं सिर्फ निभाने के लिये। 
प्यार से ईद मनाना है गले मिल-जुल कर,
चाँद निकला है हमें इतना बताने के लिये।
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 ईद मुबारक हो 
-कुँवर कुसुमेश  
हुक्मे-रब्बी=ईश्वरीय आदेश 

Wednesday, June 24, 2015

अब्र बरसे हैं.........................


लोग पानी को खूब तरसे हैं। 
तब कहीं जाके अब्र बरसे हैं। 
देर क्यों लग रही  मेरे मौला,
ख्वाब मेरे तो मुख़्तसर से हैं। 
-कुँवर कुसुमेश
 अब्र-बादल ,मुख़्तसर-थोड़े 

Saturday, June 20, 2015

योग दिवस


"अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस" का प्रारम्भ होना भारत के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि है। 
बाबा रामदेव जी की विनम्रता,सहनशीलता और योग-परिश्रम की दाद देनी होगी।   ऐसे ही लोग युग पुरुष कहलाते हैं। 

इस ऐतिहासिक अवसर पर 
मेरे कुछ दोहे :-

योग दिवस प्रारम्भ यूँ ,मानो कोई पर्व। 
सचमुच इस उपलब्धि पर,भारत को है गर्व।। 

दर्ज हुआ इतिहास में,देखो इक्किस जून। 
योग मनोमष्तिष्क को,देगा बड़ा सुकून।। 

बिन औषधि बिन डॉक्टर,मानव बने निरोग। 
जिससे यह सम्भव हुआ,कहते उसको योग।। 

बरसों के बीमार को,दो दिन में आराम। 
खुद ही करके देखिये,प्रातः प्राणायाम।। 
-कुँवर कुसुमेश 
मोबा:09415518546 

Tuesday, June 16, 2015

स्वास्थ्य को खूब निखारो..........


यारो इक्किस जून का,करिये खूब प्रचार। 
योग दिवस उस रोज़ से,प्रकटेगा इस बार। 
प्रकटेगा इस बार,योग से रोग भगेंगे। 
जय जय बाबा राम देव,सब लोग कहेंगे। 
करके प्राणायाम,स्वास्थ्य को खूब निखारो। 
बिन पैसे हो ठीक,जियो मस्ती में यारो। 
-कुँवर कुसुमेश 

Friday, June 5, 2015

सभ्यता गई..........................


आगे बढ़ती पीढ़ी अपने-अपने ही रास्ता गई। 
पिछली पीढ़ी से क्या लेना दुनिया को ये बता गई। 
कल तक तो सभ्यता के कारण भारत का सर ऊँचा था,
बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड के चक्कर में सभ्यता गई। । 
-कुँवर कुसुमेश