Tuesday, May 3, 2011


जनसंख्या बढ़ती गई

कुँवर कुसुमेश

जनसंख्या बढ़ती गई,यूँ ही बेतरतीब.
तो मानव को अन्न-जल,होगा नहीं नसीब.

जनसंख्या की वृद्धि के,निकले ये परिणाम.
जीवन के हर मोड़ पर, कलह और कुहराम.

पैदा होते प्रति मिनट,नित बच्चे तैतीस.
विषम परिस्थति हो गई,क्या होगा हे ईश. 

फुटपाथों पर सो रहे,लाखों भूखे पेट.
क़िस्मत करने पर तुली,इनका मटिया-मेट. 

जनसंख्या ने कर दिया,पैदा अहम् सवाल.
कैसे भावी पीढियां,झेलें भूख-अकाल.

बढ़ते जाते आदमी,सीमित मगर ज़मीन.
अन्न बढ़ायें किस तरह,बेचारे ग्रामीण ?
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Friday, April 22, 2011


मुँह चिढ़ाती ये रात,मुश्किल है


कुँवर कुसुमेश

मुश्किलों से निजात मुश्किल है.
खूबसूरत हयात मुश्किल है.

कितनी शोरिश पसंद है यारब,
वक़्त की काइनात मुश्किल है.

जिस तरफ भी नज़र उठी देखा,
बारहा हादसात,मुश्किल है.

मुस्कुराती सुबह से ताक़तवर,
मुँह चिढ़ाती ये रात,मुश्किल है.

रोज़ उठने लगा है गिर-गिर कर,
पर्दा-ए-वाक़यात,मुश्किल है.

अर्श वाला भी अब नहीं सुनता,
ये 'कुँवर' एक बात मुश्किल है.
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शोरिश पसंद -उपद्रव करने वाला
बारहा- अक्सर,
पर्दा-ए-वाक़यात =घटनाओं से पर्दा.

Saturday, April 9, 2011


कश्तियाँ मुब्तला किस सफ़र में
     

 कुँवर कुसुमेश 

डगमगाने लगी है भंवर में.
कश्तियाँ मुब्तला किस सफ़र में.

आँख से निभ रही आंसुओं की,
कुछ सुकूं है निहाँ चश्मे-तर में.

आदमी छोड़ कर आदमीयत,
डूबता जा रहा मालो-ज़र में.

ज़िन्दगी के लिए है ज़रूरी,
लज़्ज़तें ढूंढ लेना ज़हर में.

फ़र्क कुछ भी नहीं रह गया है,
ऐब में और यारो ! हुनर में.

वक्ते-रुख्सत 'कुँवर' देख लेना,
कुछ न हासिल हुआ उम्र भर में.
          
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मुब्तला-फंसी हुई,निहाँ-छिपा हुआ,
चश्मेतर-डबडबाई आँख,वक्तेरुख्सत-अंतिम समय 

Saturday, April 2, 2011



भारत जीत गया है 


कुँवर कुसुमेश 

जीत गया है वर्ड कप, अपना भारत देश.
तुम्हें बधाई दे रहे ,दिल से कवि कुसुमेश.

दिल से कवि कुसुमेश मिठाई बाटें घर घर.
ख़ुद भी खायें आप मिठाई आज पेट भर.

क्रिकेट वर्ड कप का अंतिम दिन बीत गया है.
ढोल - नगाड़े पीटो भारत जीत गया है. 


Wednesday, March 30, 2011


फिर सलीबों पे मसीहा होगा


कुँवर कुसुमेश 

क्या हक़ीक़त में करिश्मा होगा.
वक़्त कल आज से अच्छा होगा.

लोग कहते हैं कि ऐसा होगा,
जबकि लगता है कि उल्टा होगा.

साँप सड़कों पे नज़र आयेंगे,
और बाँबी में सपेरा होगा.

वक़्त दोहरा रहा है अपने को,
फिर सलीबों पे मसीहा होगा.

आदमीयत से जिसको मतलब है,
देख लेना वो अकेला होगा.

है 'कुँवर' सोच ये आशावादी,
रात जायेगी,सवेरा होगा.
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 सलीब-सूली 

Tuesday, March 22, 2011


"जल"
 

कुँवर कुसुमेश 

विषमय होता जा रहा , सरिताओं का नीर.
लेकिन सुनता है नहीं,कोई इनकी पीर.

नदियाँ पर्वत की बहें,हर पल सिल्ट समेत.
यहाँ सिल्ट का अर्थ है,पत्थर, बजरी, रेत .

यही सिल्ट मैदान में,बाधित करे बहाव.
दूषित जल का मुख्य है,कारण जल ठहराव.

दूषित जल से यदि मरे,नित्य समुद्री जीव.
पूरे पर्यावरण की,हिल जायेगी नीव.

जलाभाव से मच रहा,चंहु दिशि हाहाकार.
लगातार धटने लगा,भू का जल भण्डार.

कहीं पड़ा सूखा कभी,कहीं आ गई बाढ़.
ज़रा सोचिये प्रकृति क्यों,करती ये खिलवाड़. 
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Wednesday, March 16, 2011


न बच कर  निकल पाओगे इस गली से

   कुँवर कुसुमेश 

अजब रंग रंगों में है रंगे-होली,
की बूढ़े-जवां कर रहे हैं ठिठोली.

न बच कर निकल पाओगे इस गली से,
जो कल तक थी शर्मा रही आज बोली.

लिबासों में होते हुए बरहना है,
ग़नीमत है ये,कोई नीयत न डोली.

मुबारक उसे जश्ने-होली हो जिसने,
मुहब्बत के रंगों में रूहें डुबोली.

बड़ा नासमझ है जो होली के दिन भी-
गुनाहों से भीगी ये चादर न धो ली.

हम अहले-वतन एक हैं एक रह कर,
मानते रहेंगे 'कुँवर' ईद-होली.

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   बरहना-निर्वस्त्र, अहले वतन-वतन वाले