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Wednesday, October 22, 2014

रौशनी घर घर बहुत है..............................


दीपावली की मुबारकबाद के साथ एक ताज़ा ग़ज़ल 

-कुँवर कुसुमेश 

यक़ीनन रौशनी घर घर बहुत है। 
उजालों में भी हाँ, तेवर बहुत है। 

अँधेरा दूर करना है तो झांको,
अँधेरा आपके अंदर बहुत है। 

बुराई से निपटने के लिए तो,
अकेला प्रेम का अक्षर बहुत है।

तुम्हें विश्वास हो अथवा नहीं हो, 
ये दुनिया वाक़ई सुन्दर बहुत है। 

भटकने लग गया है दिल तुम्हारा,
ये दिल लगता है यायावर बहुत है। 

"कुँवर" मक्ते पे आ करके तो ठहरो,
कि तुमने कह दिया खुलकर बहुत है। 
*****
शब्दार्थ:-यायावर-भटकने वाला,

अर्कान : मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन 
वज़्न :     I S S S    I S S S    I S S 
नमूना बहर : तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ 
बहर का नाम:बहरे-हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़ 

Monday, March 11, 2013

उठाई तुमने कि हमने दिवार क्या जाने .


कुँवर कुसुमेश 

तड़पता आदमी सब्रो-क़रार क्या जाने .
जो नफ़रतों में पला हो वो प्यार क्या जाने .

चमन की बात ही करना है तो चमन से करो,
ख़िज़ाँ , ख़िज़ाँ है महकती बहार क्या जाने .

दिलों के बीच में उठती दिखाई देती है,
उठाई तुमने कि हमने दिवार क्या जाने .

मिले हैं अपने पराये सभी से जिसको फ़रेब,
भरोसा कैसे करे,ऐतबार क्या जाने .

बिखरना,टूटना सीखा है तड़पती शै ने,
ये दिल है ये भला बातें हज़ार क्या जाने .

न जाने दोस्त समझता है या कोई दुश्मन,
करे 'कुँवर' कोई किसमें शुमार क्या जाने .
*****

Friday, November 2, 2012

उफ़......................



-कुँवर कुसुमेश 


उधर अपनी सरकार मंहगाई वाली .
इधर पास आने लगी  है दिवाली .

मियाँ , गैस ने तो नरक कर दिया है,
कई घर में देखो सिलिंडर है खाली .

समझ में मेरे आज तक है न आया,
कि ये किस जनम की कसर है निकाली . 

यही होगा इस देश में जब चुनोगे-
इलेक्शन में हर बार गुंडे-मवाली .

'कुँवर' की दुआ आप सब के लिए है,
रहे घर में बरकत,मिटे तंगहाली .
*****

Wednesday, October 17, 2012

तस्वीरें




कुँवर कुसुमेश 

दिखाने को तो दिखलाती रही दीवार तस्वीरें .
मगर तस्वीर लगती हैं तो बस दो-चार तस्वीरें .

पकड़ जायेगा मुजरिम छुप न पायेगा बहुत दिन तक,
बराबर छापता जाये अगर अखबार तस्वीरें .

हमारी सभ्यता को बन के दीमक चाटने वाली,
बदन दिखला रहीं खुलकर सरे-बाज़ार तस्वीरें .

घरों से देवताओं- देवियों के चित्र ग़ायब हैं,
घरों में अब नज़र आती हैं कुछ बेकार तस्वीरें .

शहीदों की वो तस्वीरें जिन्हें हम सर झुकाते हैं,
समय की भेंट चढ़ जायें न वो दमदार तस्वीरें .

पड़े जिस पर नज़र तो फख्र से सर और ऊँचा हो,
करो ऐसी 'कुँवर'  हर मोड़ पर तैयार तस्वीरें .
*****


Friday, August 31, 2012

चल रहे हैं लोग जलती आग पर........



कुँवर कुसुमेश 

चल रहे हैं लोग जलती आग पर.
बेसुरे भी लग रहे हैं राग पर.

नज़्म अच्छी या बुरी जैसी भी हो,
वाह,कहने का चलन है ब्लॉग पर.

आदमी पर मत कभी करिये यक़ीं,
आप कर लीजे भरोसा नाग पर.

दुश्मनी का खैरमक़दम हो रहा,
और डाका प्यार पर,अनुराग पर.

भ्रष्ट नेता आज हिन्दुस्तान के,
ख़ुश बहुत दामन के अपने दाग पर.

दूसरों के काम तो आओ कभी,
है 'कुँवर' हमको भरोसा त्याग पर.
*****
 खैरमक़दम=स्वागत   

Monday, March 19, 2012

फूल के नाम पे काँटे ही मिले हैं अब तक......




कुँवर कुसुमेश 

फूल के नाम पे काँटे ही मिले हैं अब तक.
और हम हैं कि उमीदों पे टिके हैं अब तक.

दौरे-हाज़िर ने उसे क़ाबिले-कुर्सी माना,
हाथ जिस जिस के गुनाहों में सने हैं अब तक.

लाख आँधी ने चराग़ों को बुझाना चाहा,
टिमटिमाते हुए कुछ फिर भी दिये हैं अब तक.

क्या कहूँ गर्दिशे-अय्याम तुझे इसके सिवा,
तेरी चाहत के हँसी फूल खिले हैं अब तक.

चाहता हूँ कि कहूँ और भी अशआर 'कुँवर'
पर इसी शेर में लिल्लाह फँसे हैं अब तक.
*****
दौरे-हाज़िर=वर्तमान समय,   क़ाबिले-कुर्सी=कुर्सी के योग्य.
गर्दिशे-अय्याम=संकट के दिन 

Sunday, January 29, 2012

सज़्दा ख़ुदा के सामने करना फुज़ूल है.......


कुँवर कुसुमेश 

ऐसा नहीं कि रस्मे-मुहब्बत नहीं रही.
दुनिया में सिर्फ आज शराफ़त नहीं रही.

तुमने तो बेहिसाब मुझे दी है गालियाँ,
मैं भी वो गालियाँ दूं ये आदत नहीं रही.

सज़्दा ख़ुदा के सामने करना फुज़ूल है,
मन में तुम्हारे साफ़ जो नीयत नहीं रही.

दो वक़्त की नसीब हों बच्चों को रोटियाँ,
ऐसी किसी ग़रीब की क़िस्मत नहीं रही.

बेकार हो गया है वफ़ा का वजूद भी,
हर्फ़े-वफ़ा में अब कोई ताक़त नहीं रही.

देखा न एक बार पलट करके भी 'कुँवर'
गोया ख़ुदा को वाक़ई फुरसत नहीं रही.
*****
शब्दार्थ:-
 रस्मे-मुहब्बत =मुहब्बत की रस्म,
हर्फ़े-वफ़ा=वफ़ा शब्द 

Thursday, November 10, 2011

मुश्किलों से निजात मुश्किल है




कुँवर कुसुमेश 

मुश्किलों से निजात मुश्किल है.
खूबसूरत हयात मुश्किल है.

कितनी शोरिश-पसंद है यारब,
वक़्त की काइनात मुश्किल है.

जिस तरफ भी नज़र उठी देखा,
बारहा हादसात मुश्किल है.

मुस्कुराती सुबह से ताक़तवर,
मुँह चिढ़ाती ये रात मुश्किल है.

रोज़ उठने लगा है गिर गिर कर,
पर्दा-ए-वाक़यात मुश्किल है.

अर्श वाला भी अब नहीं सुनता,
ये 'कुँवर' एक बात मुश्किल है.
*****
शोरिश-पसंद=उपद्रव करने वाला. 
बारहा=अक्सर.
पर्दा-ए-वाक़यात=घटनाओं से पर्दा.

Wednesday, August 24, 2011


 तूफां के मुक़ाबिल अन्ना

कुँवर कुसुमेश 

वाक़ई आज है तूफां के मुक़ाबिल अन्ना.
कल मगर देखना मिल जायेगी मंज़िल अन्ना.

जो लड़ाई में हैं इस दौर में शामिल अन्ना,
दौरे-मुश्किल नहीं उनके लिए मुश्किल अन्ना.

अम्न हो ,चैन हो भारत में इसी मक़सद से ,
खेलता जा रहा खतरों से है तिल-तिल अन्ना.

तैरने वाले तलातुम से नहीं घबराते,
तैरने वाले को मिल जाते हैं साहिल अन्ना.

आप इस दौर के गाँधी है ,यकीं होता है,
नाज़ करता है तेरे नाम पे ये दिल अन्ना.

जंग जन लोकपाल बिल का हमीं जीतेंगे.
हाँ,'कुँवर'करके दिखायेंगे ये हासिल अन्ना.
*****
 तलातुम=बाढ़ , साहिल=किनारे 

Thursday, August 11, 2011


धागों पे ऐतबार ही राखी है 
कुँवर कुसुमेश

धागों पे ऐतबार ही राखी है दोस्तो.
भाई-बहन का प्यार ही राखी है दोस्तो.

हीरे-जवाहरात नहीं, मालो-ज़र नहीं,
रेशम का तार-तार ही राखी है दोस्तो.

वक्ते-सुबह कलाई में राखी का बांधना.
लम्हा ये खुशगवार ही राखी है दोस्तो.

इसमें निहाँ है अहदे-हिफ़ाज़त का फ़लसफ़ा,
रिश्तों का ये सिंगार ही राखी है दोस्तो.

हर इक बहन पे जान निछावर हो भाई की,
दौलत ये बेशुमार ही राखी है दोस्तो.

आँखें बिछी हों भाई की राहों में तो 'कुँवर'
भाई का इंतज़ार ही राखी है दोस्तो.
*****
वक्ते-सुबह=सुबह के वक़्त,निहाँ=छुपा हुआ.
अहदे-हिफ़ाज़त=सुरक्षा की प्रतिज्ञा.

Friday, July 29, 2011


दिखा देता अँधेरे से कोई लड़ता दिया उसको

कुँवर कुसुमेश
                                                
  बड़ा मायूस है वो ज़िन्दगी से क्या हुआ उसको.
दिखा देता अँधेरे से कोई लड़ता दिया उसको.

वफ़ा के नाम पे जिसने हमेशा बेवफाई की,
यक़ीनन रास आयेगा नहीं हर्फ़े-वफ़ा उसको.

कहे या मत कहे कोई उसूलन तो यही सच है,
कि उसने दिल दुखाया है तो क्या दूँ मैं दुआ उसको.

सुनाता भ्रष्ट नेताओं को जी भर के खरी-खोटी.
शराफत का हमेशा रोकता है दायरा उसको.

भटकने लग गया जों आदमी राहे-मुहब्बत से.
अदब की रोशनी शायद दिखा दे रास्ता उसको.

'कुँवर'ख़ुद पर भरोसा और मौला पर भरोसा रख,
भरोसा जिसको मौला पर है मौला देखता उसको.
 *******
 हर्फ़े-वफ़ा=वफ़ा शब्द, राहे-मुहब्बत=प्यार की राह 

Monday, July 11, 2011

बेवफा छोड़ के जाता है चला जा 

कुँवर कुसुमेश

अनगिनत ख्वाबों की ताबीर बना लेने दे.
मुझको बिगड़ी हुई तक़दीर बना लेने दे.

बेवफा छोड़ के जाता है चला जा लेकिन,
दिल के शीशे में तो तस्वीर बना लेने दे.

तू ने अपनी तो बना ली है अलग ही दुनिया,
मुझको भी छोटी-सी जागीर बना लेने दे.

मैं न उड़ पाऊँगा शायद कभी पंछी की तरह,
पाँव के वास्ते ज़ंजीर बना लेने दे.

कोई पूछेगा,दिखा दूंगा निशानी तेरी,
दिल में चुभता हुआ इक तीर बना लेने दे.

है'कुँवर'प्यार को दर्जा-ए-इबादत हासिल,
आ इसे क़ाबिले-तौक़ीर बना लेने दे.
   ***********
दर्जा-ए-इबादत=इबादत का दर्जा.
क़ाबिले-तौक़ीर=सम्मान के क़ाबिल.

Saturday, June 4, 2011


पर्यावरण दिवस पर एक ग़ज़ल 


कुँवर कुसुमेश 

पेड़ कटने  से बढ़ी हैं अनगिनत बीमारियाँ.
नासमझ फिर भी खड़े हाथों में लेकर आरियाँ.

जन्म से ही सैकड़ो बच्चों में बीमारी दिखे,
किस तरह मांयें सुरक्षित कर सकें किलकारियाँ .

हो रहा रासायनिक खादों का इस दर्जा प्रयोग,
क्या भला होंगी विटामिनयुक्त अब तरकारियाँ.

जिनकी नज़रों में है भौतिकवाद से बढ़ कर प्रकृति,
उनके कन्धों पर यक़ीनन ही हैं ज़िम्मेदारियाँ .

अनवरत  बढ़ते प्रदूषण की बदौलत ही 'कुँवर',
हर तरफ आती नज़र दुश्वारियाँ-दुश्वारियाँ.
   
****************

Friday, May 27, 2011


 तारों के पीछे

कुँवर कुसुमेश 

छिपी है शै कोई तारों के पीछे,
ख़ुदा होगा चमत्कारों के पीछे.

मेरे महबूब तू गुम हो गया है,
सुकूने-दिल है दीदारों के पीछे,

सुना है डॉक्टर हड़ताल पर हैं,
खड़ी है मौत बीमारों के पीछे.

खबर सच्ची नहीं मिल पा रही है,
है कोई हाथ अखबारों के पीछे.

हमेशा प्यार से हिल मिल के रहना,
यही पैग़ाम त्योहारों के पीछे.

तेरे अपने 'कुँवर' दुश्मन हैं तो क्या,
चला चल तू इन्हीं यारों के पीछे.
  
 *************
   शै=चीज़,  दीदार=दर्शन, 
     सुकूने-दिल=दिल का सुकून.

Friday, April 22, 2011


मुँह चिढ़ाती ये रात,मुश्किल है


कुँवर कुसुमेश

मुश्किलों से निजात मुश्किल है.
खूबसूरत हयात मुश्किल है.

कितनी शोरिश पसंद है यारब,
वक़्त की काइनात मुश्किल है.

जिस तरफ भी नज़र उठी देखा,
बारहा हादसात,मुश्किल है.

मुस्कुराती सुबह से ताक़तवर,
मुँह चिढ़ाती ये रात,मुश्किल है.

रोज़ उठने लगा है गिर-गिर कर,
पर्दा-ए-वाक़यात,मुश्किल है.

अर्श वाला भी अब नहीं सुनता,
ये 'कुँवर' एक बात मुश्किल है.
*********
शोरिश पसंद -उपद्रव करने वाला
बारहा- अक्सर,
पर्दा-ए-वाक़यात =घटनाओं से पर्दा.

Saturday, April 9, 2011


कश्तियाँ मुब्तला किस सफ़र में
     

 कुँवर कुसुमेश 

डगमगाने लगी है भंवर में.
कश्तियाँ मुब्तला किस सफ़र में.

आँख से निभ रही आंसुओं की,
कुछ सुकूं है निहाँ चश्मे-तर में.

आदमी छोड़ कर आदमीयत,
डूबता जा रहा मालो-ज़र में.

ज़िन्दगी के लिए है ज़रूरी,
लज़्ज़तें ढूंढ लेना ज़हर में.

फ़र्क कुछ भी नहीं रह गया है,
ऐब में और यारो ! हुनर में.

वक्ते-रुख्सत 'कुँवर' देख लेना,
कुछ न हासिल हुआ उम्र भर में.
          
 ***********
मुब्तला-फंसी हुई,निहाँ-छिपा हुआ,
चश्मेतर-डबडबाई आँख,वक्तेरुख्सत-अंतिम समय 

Wednesday, March 30, 2011


फिर सलीबों पे मसीहा होगा


कुँवर कुसुमेश 

क्या हक़ीक़त में करिश्मा होगा.
वक़्त कल आज से अच्छा होगा.

लोग कहते हैं कि ऐसा होगा,
जबकि लगता है कि उल्टा होगा.

साँप सड़कों पे नज़र आयेंगे,
और बाँबी में सपेरा होगा.

वक़्त दोहरा रहा है अपने को,
फिर सलीबों पे मसीहा होगा.

आदमीयत से जिसको मतलब है,
देख लेना वो अकेला होगा.

है 'कुँवर' सोच ये आशावादी,
रात जायेगी,सवेरा होगा.
 ********
 सलीब-सूली 

Wednesday, March 16, 2011


न बच कर  निकल पाओगे इस गली से

   कुँवर कुसुमेश 

अजब रंग रंगों में है रंगे-होली,
की बूढ़े-जवां कर रहे हैं ठिठोली.

न बच कर निकल पाओगे इस गली से,
जो कल तक थी शर्मा रही आज बोली.

लिबासों में होते हुए बरहना है,
ग़नीमत है ये,कोई नीयत न डोली.

मुबारक उसे जश्ने-होली हो जिसने,
मुहब्बत के रंगों में रूहें डुबोली.

बड़ा नासमझ है जो होली के दिन भी-
गुनाहों से भीगी ये चादर न धो ली.

हम अहले-वतन एक हैं एक रह कर,
मानते रहेंगे 'कुँवर' ईद-होली.

   *****
   बरहना-निर्वस्त्र, अहले वतन-वतन वाले

Thursday, March 10, 2011


अब तो दस साल के बच्चे को भी बच्चा न समझ 


कुँवर कुसुमेश

क़ाबिले-ग़ौर है हर बात शगूफ़ा न समझ,
दौरे-हाज़िर को मेरे यार तमाशा न समझ.

जो बड़े प्यार से मिलता है लपककर तुझसे,
आदमी दिल का भी अच्छा हो वो ऐसा न समझ.

आज इन्सान के चेहरे पे कई चेहरे हैं,
मुस्कुराहट को मुहब्बत का इशारा न समझ.

आज के बच्चों पे है पश्चिमी जादू का असर,
अब तो दस साल के बच्चे को भी बच्चा न समझ.

ये कहावत है पुरानी-सी मगर सच्ची है,
तू चमकती हुई हर चीज़ को सोना न समझ.

हमसफ़र और भी हैं साथ निभाने वाले,
तू 'कुँवर'ख़ुद को लड़ाई में अकेला न समझ.

******
क़ाबिले-ग़ौर =ध्यान देने लायक, दौरे-हाज़िर=वर्तमान समय 

Sunday, February 27, 2011


गुलों पे आयेगी इक रोज़ ताज़गी फिर से

कुँवर कुसुमेश 

अँधेरा चीर के आयेगी रोशनी फिर से,
ये शाख देखना हो जायेगी हरी फिर से.

खिज़ां से डर के बहारों के ख़्वाब मत छोड़ो,
गुलों पे आयेगी इक रोज़ ताज़गी फिर से.

ज़माना आजकल इतना बदल गया गोया,
कि लोग जी रहे मर मर के ज़िन्दगी फिर से.

हमारे दिल का दरीचा खुला ही रहता है,
किसी कि याद ही आये कभी कभी फिर से.

सुबह से शाम तलक सोचता रहा अक्सर,
कभी तो आदमी बन जाये आदमी फिर से.

जो ख़ुद को कर के हवाले नसीब के सोया,
उसे 'कुँवर' की जगायेगी शायरी फिर से.
   *********